![]() धुन का पक्का विक्रमार्क पुनः पेड़ के पास लौट आया। पेड़ पर से शव को उतारा और अपने कंधे पर डाल लिया। फिर यथावत् वह श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, इस भयंकर श्मशान में अपने लक्ष्य को साधने के लिए कठोर परिश्रम कर रहे हो। क्या कभी तुममें यह संदेह उत्पन्न नहीं हुआ कि यह लक्ष्य पूरा होगा या नहीं? जो परिश्रम तुम कर रहे हो, वह अंततः निरर्थक तो नहीं हो जायेगा? रसराजा नामक कवि के विषय में वीरांग नामक राजा ने जो व्यवहार किया, वह अर्थहीन लगता है। अपनी थकावट दूर करते हुए उनकी कहानी मुझसे सुनो।'' फिर वेताल उनकी कहानी यों सुनाने लगाः
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