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कहानियाँ

देवी भागवत - 5

लेखक: चन्दामामा | 16th Sep, 2009


 
त्वष्ट्रू प्रजापति सब देवताओं में से महान थे। उन्होंने घोर तपस्या की थी। वे इंद्र से द्वेष करते थे, अतः उन्होंने तीन सिरवाले विश्वरूप की सृष्टि की। विश्वरूप उम्र में बड़ा होता गया। अपने तीन सिरों से उसे अलग-अलग काम करते हुए देखकर मुनिगण उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे। वह एक मुँह से वेद-पठन करता था, एक और मुँह से ताड़ी पीता था। तीसरे मुँह से संसार में घटित होनेवाले सब विषयों को देखता रहता था।
 
विश्वरूप पंचाग्नियों के मध्य तपस्या करने लगा। एक ही पैर पर शीतकाल में पानी में, ग्रीष्मकाल में अग्नि के बीच खड़े होकर बिना कुछ खाये-पिये तपस्या में लगा रहा। इंद्र ने जब यह सब कुछ देखा तो उसे लगा कि वह उसका पद हरने की तैयारी कर रहा है। उसने उसकी तपस्या को भंग करने का निश्चय किया। उसने अप्सराओं को भेजा। परंतु उनकी श्रृंगार चेष्टाओं ने वृत पर कोई प्रभाव नहीं डाला। वे लौटकर इंद्र के पास आ गयीं और कहा कि वृत की तपस्या को भंग करना उनके बस की बात नहीं है।
 
इंद्र ने महात्मा विश्वरूप का अंत कर देने का निर्णय लिया। उसने सोचा तक नहीं कि मैं कितना बड़ा पाप करने जा रहा हूँ। वह ऐरावत पर सवार होकर विश्वरूप के पास गया आरै उस पर उसने अपने वज्रायुध का प्रयोग किया।
 
त्वष्ट्रू को जब मालूम हुआ कि इंद्र ने उसके पुत्र की हत्या कर दी तो वह क्रोधित हो उठा। उसने अधर्वण मंत्रों को उच्चारित करके अग्नि प्रज्वलित की जिसमें से प्रकाशमान होता हुआ एक पुत्र उत्पन्न होकर निकला। उसे देखकर त्वष्ट्रू ने घोषणा की, ‘‘तुम्हारा नाम वृत होगा। तुम्हारे अग्रज का वध इंद्र ने अपने वज्रायुध से किया। उस इंद्र का अंत करने के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है। यह काम सुचारु रूप से करना।''

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