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कहानियाँ

देवी भागवत - 4

लेखक: चन्दामामा | 12th Aug, 2009


 
रंभ व करंभ दनव के बेटे थे। उनकी कोई संतान नहीं हुई, इसलिए वे दीर्घ काल तक तपस्या करते रहे। करंभ ने पंच नदी तीर्थ में डूबकर तपस्या की। रंभ ने एक पेड़ पर चढ़कर बैठे-बैठे तपस्या की।
 
इंद्र ने मगर बनकर पंच नदी में प्रवेश किया और करंभ को मार डाला। अपने भाई की मौत पर रंभ आवेश में आ गया और अग्निहोत्री को अपना सिर काटकर देने के लिए सन्नद्ध हुआ।
 
जब अपना सिर काटने के लिए रंभ ने तलवार उठा ली तब अग्नि देव प्रत्यक्ष हुए और पूछा ‘‘क्यों आत्महत्या करने पर तुल गये? इससे भला क्या लाभ होगा? तुम्हारी तपस्या से मैं प्रसन्न हूँ। पूछो, क्या वर चाहिये तुम्हें?''
 
‘‘देव, आपको सचमुच मुझपर दया हो तो एक अजेय पुत्र दीजिये। देवता व दानव भी उसे जीत न सकें।'' रंभ ने कहा।
 
‘‘तुम्हारी मनोच्छा पूर्ण हो'' कहकर अग्निहोत्री अदृश्य हो गये।
 
रंभ जब लौटकर आ रहा था तब उसने एक सुंदर प्रदेश में एक भैंस देखा। यह प्रदेश यक्षों के अधीन था। वह महिषि उसके साथ-साथ पाताल आयी।
 
वहाँ इस भैंस का पीछा एक और भैंस ने किया। दूसरे भैंसे की इस करतूत से रंभ नाराज़ हो उठा और उसे खूब पीटा। उस भैंस ने रंभ को ऊपर उठाया और अपनी सींगों से उसे मार डाला। रंभ की इस हालत को देखकर महिषि भी उसके साथ-साथ आग में जल गयी। उन लपटों से दो राक्षस प्रकट हुए। एक है महिषि और दूसरा रक्तबीज।
 
राक्षसों ने महिषासुर को अपना राजा चुना। महिषि ने कांचन पर्वत पर घोर तपस्या की। फलस्वरूप ब्रह्मदेव प्रत्यक्ष हुए। उसन ब्रह्मा से वर मांगा ‘‘महात्मा, मेरी मौत ही न हो''।

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