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कहानियाँ

देवी भागवत - 3

लेखक: चन्दामामा | 24th Jul, 2009


 
शुक ने हठ किया कि विवाह नहीं करूँगा तो व्यास ने स्वरचित देवी भागवत् सुनायी।
 
विष्णु बरगद के पत्ते पर बालक बने विराजमान थे। वे सोचने लगे, ‘‘मैं यहाँ बालक बनकर क्यों हूँ? किसने मेरी सृष्टि की? ये विवरण मुझे कैसे मालूम हो पायेंगे? उसे इस परिस्थिति में देखकर देवी के हृदय में दया जाग उठी। उन्हें उन्होंने आधा श्लोक सुनाया और कहा, ‘‘यही सबकुछ है। अगर यह जान जाओगे तो समझ लेना, तुम अपने को भी जान गये।''
 
विष्णु ने वह आधा श्लोक सुन तो लिया पर वे उसका अर्थ समझ नहीं पाये।
 
वे उस आधे श्लोक का पठन करने लगे। इतने में महादेवी विष्णु के सम्मुख प्रत्यक्ष हुई। उनके चार हाथों में शंख, चक्र व गदा आदि थे। उन्होंने उत्तम कोटि के स्वर्ण वस्त्र पहन रखे थे। उनकी ही जैसी शक्तियाँ भी उनके साथ-साथ आयीं।
 
महादेवी को देखकर विष्णु दिग्भ्रांत रह गये। उनके मुँह से कोई बात नहीं निकली। तब देवी ने उनसे कहा, ‘‘माया के कारण तुमने मुझे भुला दिया। अब तुम सगुणी हो, मैं हूँ सत्वशक्ति। तुम्हारी नाभि के कमल में ब्रह्मा का जन्म होगा। रजोगुणी होकर वह लोकों की सृष्टि करेंगे। उस सृष्टि पर तुम्हारा शासन चलेगा। उस ब्रह्मदेव की भौंहों के बीच में से क्रोध के कारण रुद्र का जन्म होगा। वह रुद्र घोर तपस्या करेगा। फलस्वरूप वह सगुण बनेगा। प्रलय काल में ब्रह्मा से रचित संसार का वह सर्वनाश करेगा। मेरी सहायता प्राप्त करके ही तुम ब्रह्माण्ड का पालन-पोषण कर पाओगे, अतः मुझ सत्वशक्ति को जानो और पहचानो। मैं सदा तुम्हारे वक्षस्थल में ही निवास करूँगी।'' तब विष्णु ने महादेवी से कहा, ‘‘मैंने एक आधा श्लोक सुना। आप बताइये मैंने उसे कैसे सुना?''

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