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कहानियाँ

सुन्दर काण्ड - 3

लेखक: चन्दामामा | 12th Feb, 2010


 

हनुमान शिंशुपा वृक्ष पर चढ़कर, चारों ओर देखने लगा। अशोक वन इन्द्र के नन्दनवन की तरह था। उसमें फल और फूलों के पेड़ थे। पक्षी और पशु थे। जगह-जगह चबूतरे थे। महल और कमलों के तालाब थे। सवसे अधिक अशोक वृक्ष थे।


कुछ दूरी पर ऊँचा सफेद मण्डप दिखाई दे रहा था। उसमें हज़ार खम्भे थे। मोती से जड़ी सीढ़ियॉं और सोने के चबूतरे थे। वह एक चैत्य के आकार में था।

फिर हनुमान को सीता दिखाई पड़ी। उसने साड़ी पहिन रखी थी। उसके चारों ओर राक्षस स्त्रियॉं थीं। वह बहुत निर्बल हो गई थी। आहें भर रही थी। दयनीय प्रतीत होती थी।


न नहाने की वजह से शरीर पर धूल जमा थी। गहने न के बराबर थे। उसके बालों की एक चोटी-सी बन गई थी।


वह स्त्री सीता ही होगी, यह निर्धारित करने के लिए हनुमान ने यों सोचा। जब रावण उसको उठाकर ले जा रहा था, तो उस स्त्री में वे कुछ लक्षण दिखाई दिये, जो उन्होंने उसमें देखे थे। चन्द्रमा-सा मुँह था। लम्बी भौंहें। काले बाल, सुन्दर कमर-सीता यद्यपि बहुत दुखी और निर्बल थी तो भी ये लक्षण उसमें साफ़ दिखाई देते थे।


यही नहीं, राम ने भी सीता की कुछ निशानियॉं बताई थीं। इसलिए वह इस स्त्री को पहिचानने की पूरी कोशिश कर रहा था।


राम ने जिन आभूषणों के बारे में कहा था, उनको सीता ने पहनना न चाहा और पास के पेड़ की टहनियों पर लटका दिया था। परन्तु उनमें कान और हाथ के आभूषण थे। उसके कान और हाथ के निशान भी यह बता रहे थे।


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