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कहानियाँ

देवी भागवत - 2

लेखक: चन्दामामा | 17th Jun, 2009


‘‘इतनी सी बात पर डर गये? मेरे हाथों से कितने बड़े-बड़े राक्षस नहीं मरे !'' विष्णु यह कह ही रहे थे कि इतने में वे दोनों राक्षस वहाँ आ गये और ब्रह्मा से कहने लगे, ‘‘यहाँ छिपे हो? तुम्हें ढूँढ़ना हमारे लिए क्या मुश्किल है? क्या यह तुम्हारी रक्षा करेगा? अकेले ही क्यों नहीं मरते, अपने साथ इसे भी क्यों ले जाना चाहते हो?''
 
विष्णु ने ब्रह्मा को अपने पीछे आने का संकेत दिया और राक्षसों से कहा, ‘‘जो मुँह में आया, मदमत्त होकर बके जा रहे हो। ठहरो, अभी तुम दोनों को ठिकाने लगाता हूँ।'' फिर वे उनसे युद्ध करने सन्नद्ध हो गये।
 
विष्णु और राक्षस मधु के बीच जो घमासान युद्ध शुरु हुआ, वह आकाश से देवी देख रही थीं। समुद्र उमड़ पड़ा। मधु को थका-मांदा देखकर कैटभ विष्णु के साथ मल्ल युद्ध करने लगा। अब दोनों राक्षस अपनी पूरी शक्ति लगाकर विष्णु से लड़ने लगे। इससे विष्णु बलहीनता महसूस करने लगे। क्या किया जाए, उन्हें नहीं सूझा। वे निर्णय नहीं कर पाये कि राक्षसों को कैसे मार डाला जाए? अब वे स्वयं अपनी रक्षा की चिंता में लग गये।
 
विष्णु को सोच में पड़ा देखकर उन राक्षसों ने कहा, ‘‘युद्ध करने की शक्ति न हो तो हमारा दास बन जाओ। झुककर हमें प्रणाम करो। तुमने ऐसा नहीं किया तो पहले तुम्हें मार डालेंगे और फिर ब्रह्मा को।'' विष्णु ने धीमे स्वर में उनसे कहा, ‘‘थकेमांदे को, पलटकर जानेवालों को, भयभीत को, युद्ध क्षेत्र में गिरे हुए मनुष्य को मारना वीरधर्म नहीं है। आप दो हैं और मैं अकेला। कुछ क्षण विश्राम लेकर फिर से तुमसे युद्ध करूँगा। क्या तुम दोनों युद्ध धर्म से अनभिज्ञ हो?''
 
‘‘ठीक है, विश्राम करो। हम भी विश्राम करेंगे।'' दोनों राक्षसों ने कहा। तब विष्णु ने अपनी दिव्य दृष्टि से जाना कि इन दोनों राक्षसों को वरदान प्राप्त हो चुके हैं। वे अपने ही आप कहने लगे, ‘‘अनावश्यक ही मैं इनसे युद्ध करने लगा। वरदान के बल पर इनकी मृत्यु नहीं होगी। ये मृत्यु से मुक्त हैं। फिर भला इन्हें कैसे मारा जा सकता है?'' उनमें तनाव बढ़ता गया। आख़िर उन्होंने जगदांबा का स्मरण किया।
 
‘‘माते ! तुम्हारी सहायता के बिना इस राक्षस को मारना मेरे लिए संभव नहीं है। शायद वे ही मेरा अंत कर डालेंगे। तुम्हीं ने इन्हें वर दिया था। तुम्हीं को अब बताना होगा कि ये कैसे मारे जा सकते हैं।'' विष्णु ने मन ही मन जगदांबा से पूछा।

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